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भारत की 5 सबसे लोकप्रिय सरकारी योजनाएं: पात्रता, लाभ, उपलब्धियां और जमीनी हकीकत

भारत की 5 सबसे लोकप्रिय सरकारी योजनाओं - आयुष्मान भारत, पीएम-किसान, पीएम आवास, उज्ज्वला और जन धन योजना की पात्रता, लाभ, उपलब्धियां और जमीनी हकीकत का गहन विश्लेषण। नवीनतम आंकड़ों और निष्पक्ष मूल्यांकन के साथ।

Reported by Tanvi Pandey and edited by Tanvi Pandey

हर साल बजट के आसपास एक ही चीज़ सुनने को मिलती है, “इस बार स्कीम का बजट बढ़ा दिया गया”, “नई किस्त जारी”, “रिकॉर्ड लाभार्थी”। लेकिन असली सवाल ये है कि ज़मीन पर इन योजनाओं का क्या हाल है। आयुष्मान भारत, पीएम-किसान, पीएम आवास योजना, उज्ज्वला और जन धन, ये पांच नाम लगभग हर भारतीय परिवार ने किसी न किसी रूप में सुने हैं, क्योंकि इनका दायरा अरबों-खरबों रुपये और दसियों करोड़ लाभार्थियों तक फैला है।

इस आर्टिकल में हम इन पांच योजनाओं को बारी-बारी से खंगालते हैं- कब शुरू हुई, किसे फायदा मिलता है, अब तक के आंकड़े क्या कहते हैं, और सबसे ज़रूरी- ज़मीन पर असल तस्वीर क्या है, सिर्फ सरकारी प्रेस रिलीज़ नहीं।

इस आर्टिकल में:

  1. आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY)
  2. पीएम-किसान सम्मान निधि
  3. प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY)
  4. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना
  5. प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY)

1. आयुष्मान भारत योजना: हर परिवार को 5 लाख का इलाज, मुफ्त में

23 सितंबर 2018 को रांची से प्रधानमंत्री मोदी ने जिस स्कीम का ऐलान किया था, वो आज दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम बन चुकी है। नाम भले आयुष्मान भारत हो, लेकिन इसका औपचारिक नाम प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) है। आइडिया सीधा था- गरीब परिवार बड़ी बीमारी की वजह से अपनी ज़िंदगी की जमा-पूंजी न खो दें। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की सिफारिशों पर बनी इस स्कीम के पीछे असली मसला यही था कि भारत में मेडिकल खर्च की वजह से हर साल लाखों परिवार गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते थे।

मिलता क्या है: हर पात्र परिवार को साल में ₹5 लाख तक का कैशलेस इलाज। सिर्फ बड़े ऑपरेशन ही नहीं, अस्पताल जाने से पहले और डिस्चार्ज के बाद का खर्च भी इसी में आता है। कवरेज लिस्ट में 1,393 से ज़्यादा प्रोसीजर शामिल हैं, और कार्ड किसी भी एम्पैनल्ड सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में पूरे देश में चलता है। यानी दिल्ली का कार्ड बिहार के अस्पताल में भी काम करेगा। न कोई एडवांस पेमेंट, न कागज़ी झंझट।

पात्रता का आधार SECC 2011 का डेटा है। गांवों में आर्थिक रूप से वंचित परिवार और शहरों में कुछ तय व्यावसायिक कैटेगरी के लोग अपने-आप इसमें कवर हो जाते हैं, अलग से अप्लाई करने की ज़रूरत नहीं। बस अपनी एलिजिबिलिटी चेक करनी होती है PMJAY की वेबसाइट या हेल्पलाइन पर, और फिर आयुष्मान कार्ड बन जाता है, जो इलाज के वक्त पहचान का काम करता है।

नंबर्स की बात करें तो: जून 2026 तक लगभग 58.45 करोड़ लाभार्थी इस स्कीम के दायरे में आ चुके हैं, और सरकार का टारगेट 2026-27 तक करीब 86.3 करोड़ तक पहुंचने का है। जुलाई 2025 तक 41 करोड़ से ज़्यादा आयुष्मान कार्ड बन चुके थे और 9.84 करोड़ से ज़्यादा लोग अस्पताल में भर्ती होकर इलाज करा चुके थे। जून 2026 तक यह संख्या 10-12 करोड़ पार कर जाने का अनुमान है।

पर यहां एक चीज़ ध्यान देने वाली है, स्कीम का यूटिलाइज़ेशन रेट सिर्फ करीब 34.2% के आसपास बताया जा रहा है। मतलब बहुत सारे एलिजिबल परिवारों को अभी भी पता ही नहीं है कि उनका कार्ड बन सकता है, या बन गया है तो उसका इस्तेमाल कैसे करें। ज़मीन पर दिक्कत यही है। छोटे शहरों और गांवों में प्राइवेट अस्पतालों की भागीदारी अब भी कम है, जिसकी वजह से मरीज़ को इलाज के लिए बड़े शहर की दौड़ लगानी पड़ती है। डॉक्टर्स और हेल्थ पॉलिसी पर काम करने वाले लोग लगातार कहते रहे हैं कि प्राइमरी हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर मज़बूत किए बिना अकेला इंश्योरेंस कवर पूरी समस्या नहीं सुलझा सकता।

सरकार की तरफ से आयुष्मान मित्र जैसे फ्रंटलाइन वर्कर्स तैनात किए गए हैं, फ्रॉड रोकने के लिए IT-बेस्ड मॉनिटरिंग लगाई गई है, और हेल्थ-एंड-वेलनेस सेंटर्स की संख्या बढ़ाई जा रही है। दिशा सही है, लेकिन रफ्तार और पहुंच। दोनों में अभी सुधार की गुंजाइश साफ बची है।


2. पीएम-किसान सम्मान निधि: हर साल सीधे खाते में ₹6,000

गोरखपुर से 24 फरवरी 2019 को लॉन्च हुई ये स्कीम (असल में लागू 1 दिसंबर 2018 से ही हो गई थी) किसानों को सीधे उनके बैंक खाते में पैसा भेजती है। ₹2,000 की तीन किस्तों में, साल का ₹6,000। न बीच में कोई बिचौलिया, न कागज़ी देरी। मकसद साफ था: मौसम की मार, बाज़ार के उतार-चढ़ाव और साहूकारों के कर्ज़ के बीच फंसे किसान को कम से कम एक स्थिर सहारा मिल जाए।

शुरुआत में सिर्फ 2 हेक्टेयर तक ज़मीन वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए थी ये स्कीम, लेकिन जून 2019 में सरकार ने इसका दायरा बढ़ाकर सभी भूमिधारक किसान परिवारों तक कर दिया,  जोत का साइज़ कुछ भी हो। हां, संस्थागत भूमिधारक, संवैधानिक पद पर बैठे लोग, सरकारी कर्मचारी (सेवारत या रिटायर्ड) और बड़े टैक्सपेयर इससे बाहर रखे गए हैं। आवेदन PM-KISAN पोर्टल पर ऑनलाइन या लोकल पटवारी/नोडल अधिकारी के ज़रिए हो सकता है। बस eKYC और बैंक डिटेल अपडेट होना ज़रूरी है, नहीं तो किस्त रुक जाती है।

जून 2026 तक यह स्कीम 22 से ज़्यादा किस्तें सफलतापूर्वक रिलीज़ कर चुकी है, और 23वीं किस्त जून-जुलाई 2026 में आने की उम्मीद है। करीब 11-12 करोड़ किसान परिवारों को फायदा मिल रहा है और कुल मिलाकर ₹3 लाख करोड़ से ज़्यादा रकम सीधे खातों में जा चुकी है।

असल फायदा कहां दिखता है? बीज, खाद, कीटनाशक खरीदने में, यानी छोटी-छोटी रोज़मर्रा की कृषि ज़रूरतों में, जहां पहले किसान साहूकार के पास जाता था ऊंचे ब्याज पर कर्ज़ लेने। लेकिन एक बड़ा गैप अभी भी है, यह स्कीम सिर्फ भूमिधारकों के लिए है, बटाईदार और भूमिहीन खेत मज़दूर इससे पूरी तरह बाहर हैं। कई किसानों को eKYC अपडेट कराने में दिक्कत आती है और कुछ राज्यों में सत्यापन के दौरान अपात्र लाभार्थियों को हटाने से लाभार्थियों की गिनती घटी भी है। कृषि क्षेत्र के जानकार लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि सिर्फ ₹6,000 सालाना से किसान की पूरी समस्या हल नहीं होती, इसे दूसरी कृषि योजनाओं के साथ जोड़ने की ज़रूरत है, और भूमिहीन मज़दूरों के लिए भी कोई समान सहायता सोची जाए।


3. प्रधानमंत्री आवास योजना: हर किसी का अपना पक्का घर

PMAY असल में दो हिस्सों में बंटी है, शहरी हिस्सा (PMAY-U), जो 25 जून 2015 को शुरू हुआ, और ग्रामीण हिस्सा (PMAY-G), जो 20 नवंबर 2016 से लागू हुआ। मकसद था 2022 तक हर पात्र गरीब परिवार को पक्का घर देना, चाहे वो झुग्गी में रह रहा हो, या कच्चे मकान में, या बेघर ही हो। इसके लिए चार रास्ते रखे गए: झुग्गी-झोपड़ी वालों का यथास्थान पुनर्वास, होम लोन पर ब्याज सब्सिडी (CLSS), पार्टनरशिप में बने किफायती घर (AHP), और लाभार्थी खुद अपना घर बनाए या बढ़ाए (BLC)।

पात्रता का आधार है- आपके या परिवार के किसी सदस्य के नाम पर देश में कहीं भी पक्का घर न हो, और आय EWS/LIG/MIG की तय सीमा में आती हो (शहरी के लिए), या SECC 2011 की लिस्ट में नाम हो (ग्रामीण के लिए)। आवेदन PMAY पोर्टल या कॉमन सर्विस सेंटर से हो सकता है। एक दिलचस्प पहलू,  घर का मालिकाना हक महिला के नाम या जॉइंट ओनरशिप में रखने को बढ़ावा दिया गया है, जो सीधे महिला सशक्तिकरण से जुड़ता है।

जून 2026 तक PMAY-U के तहत 1.18 करोड़ से ज़्यादा घर मंज़ूर हो चुके हैं, और PMAY-G का लक्ष्य 2.94 करोड़ घरों का है। दिक्कत यहां भी है, कंस्ट्रक्शन मैटीरियल की बढ़ती कीमत, ज़मीन अधिग्रहण के विवाद, और राज्य सरकारों से फंड आने में देरी, ये तीन चीज़ें लगातार प्रोजेक्ट को धीमा करती हैं। शहरी इलाकों में झुग्गी पुनर्वास और भी पेचीदा है क्योंकि लाभार्थियों की सहमति जुटाना खुद एक लंबा प्रोसेस बन जाता है। बने हुए घरों की क्वालिटी और मेंटेनेंस को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

जो काम हुआ है वो छोटा नहीं है, खासकर गांवों में लाखों परिवार पहली बार पक्की छत के नीचे आए हैं, और महिलाओं के नाम घर होने से उनकी सामाजिक स्थिति भी बदली है। लेकिन शहरी टारगेट और निर्माण की रफ्तार, दोनों में अभी काफी काम बाकी है, और सर्वे की तारीख 2026 में फिर बढ़ानी पड़ी है, जो खुद बताता है कि असली ज़मीन पर चीज़ें कागज़ी टाइमलाइन से धीमी चल रही हैं।


4. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना: चूल्हे का धुआं, गैस का सिलेंडर

1 मई 2016 को बलिया (उत्तर प्रदेश) से शुरू हुई यह स्कीम सीधी-सी बात पर टिकी है, गांव की महिलाएं लकड़ी और कोयले के धुएं में खाना बनाना बंद करें, क्योंकि इससे सांस की बीमारियां, आंखों की दिक्कत और दिल की समस्याएं बढ़ती हैं। मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देकर इस धुएं को घर से बाहर करना ही असली मकसद था।

पात्रता गरीबी रेखा से नीचे (BPL) रहने वाली महिलाओं तक सीमित नहीं, SC/ST परिवार, PMAY-G के लाभार्थी, अंत्योदय अन्न योजना वाले परिवार, वनवासी, चाय बागान मज़दूर, द्वीप क्षेत्रों के निवासी, सबके लिए दरवाज़ा खुला है। प्रोसेस भी आसान रखा गया है। नज़दीकी LPG डिस्ट्रीब्यूटर के पास फॉर्म, KYC और BPL/SECC प्रूफ जमा कर दो। कनेक्शन के लिए ₹1,600 की मदद मिलती है और चूल्हे + पहले रीफिल की कीमत EMI में चुकाने की सुविधा भी है।

जून 2026 तक 10.56 करोड़ से ज़्यादा LPG कनेक्शन इस स्कीम के ज़रिए दिए जा चुके हैं, और PMUY 2.0 के तहत 75 लाख और कनेक्शन जोड़ने का लक्ष्य है। आंकड़ा बड़ा है, लेकिन असली कहानी रीफिल में छिपी है। 2025 के डेटा के मुताबिक औसत सालाना रीफिल रेट सिर्फ 3.21 के आसपास है, और हर चार में से एक लाभार्थी साल में या तो एक भी रीफिल नहीं लेता, या सिर्फ एक। मतलब कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन सिलेंडर महंगा होने की वजह से बहुत से परिवार अब भी पुराने चूल्हे की तरफ लौट जाते हैं।

सरकार ने इसके जवाब में टारगेटेड DBT सब्सिडी (₹300) और छोटे साइज़ के सिलेंडर लाने की कोशिश की है, साथ ही दूरदराज इलाकों में डिस्ट्रिब्यूटर नेटवर्क बढ़ाने पर काम चल रहा है। लेकिन असल टेस्ट यही है, कनेक्शन बांटना आसान निकला, गैस को किफायती और टिकाऊ बनाना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है।


5. प्रधानमंत्री जन धन योजना: हर भारतीय का बैंक खाता

28 अगस्त 2014 को लॉन्च हुई PMJDY भारत के फाइनेंशियल इंक्लूज़न मिशन की सबसे बड़ी कड़ी है। आइडिया था। हर परिवार के पास कम से कम एक बैंक खाता हो, ताकि वो बचत कर सके, सरकारी सब्सिडी सीधे खाते में ले सके, और साहूकारों के ऊंचे ब्याज से बच सके। 10 साल या उससे ऊपर का कोई भी भारतीय नागरिक, जिसके पास पहले से कोई बैंक खाता नहीं है, जन धन खाता खोल सकता है — आधार न हो तो “स्मॉल अकाउंट” का ऑप्शन भी है। न मिनिमम बैलेंस की शर्त, न खाता खोलने में कोई झंझट, बैंक ब्रांच या बैंक मित्र के पास जाकर KYC दो और खाता तैयार।

खाते के साथ रुपे डेबिट कार्ड, ₹2 लाख का एक्सीडेंट इंश्योरेंस, कुछ शर्तों के साथ ₹30,000 का लाइफ इंश्योरेंस, और ₹10,000 तक की ओवरड्राफ्ट सुविधा जुड़ी हुई है।

आंकड़े यहां सबसे चौंकाने वाले हैं, 10 जून 2026 तक 58.45 करोड़ से ज़्यादा खाते खुल चुके हैं, इन खातों में जमा रकम ₹3,02,009.95 करोड़ के पार पहुंच गई है, 40.72 करोड़ से ज़्यादा रुपे कार्ड जारी हो चुके हैं, और इनमें से 32.58 करोड़ से ज़्यादा खाते महिलाओं के नाम हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी फाइनेंशियल इंक्लूज़न पहल मानी जाती है, और इसी की वजह से DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) पूरे देश में मुमकिन हुआ, यानी बाकी की चार स्कीम्स में जो पैसा सीधे खाते में जाता है, उसका इंफ्रास्ट्रक्चर असल में जन धन खातों ने ही तैयार किया है।

चुनौती क्या बची है? बहुत सारे खाते खुलने के बाद भी निष्क्रिय पड़े हैं, ओवरड्राफ्ट सुविधा का इस्तेमाल बहुत कम है, और फाइनेंशियल लिटरेसी की कमी की वजह से लोग खाते का पूरा फायदा नहीं उठा पाते। दूरदराज इलाकों में बैंक मित्र और बैंकिंग आउटलेट की पहुंच भी अभी पूरी तरह बराबर नहीं है। फिर भी, जन-धन-आधार-मोबाइल (JAM) की तिकड़ी ने जिस तरह सरकारी पैसे की लीकेज कम की है, उसे फाइनेंशियल इंक्लूज़न के क्षेत्र में एक टर्निंग पॉइंट माना जाता है।


आखिर में

पांचों स्कीम का पैटर्न लगभग एक जैसा है, पहुंच और स्केल पर भारत ने जो कर दिखाया है वो वाकई बड़ा है, करोड़ों लोगों तक पैसा, इलाज, घर, गैस और बैंक खाता पहुंचा है। लेकिन हर जगह आखिरी मील पर ही दिक्कत आती है। जागरूकता की कमी, बिचौलिए नहीं तो इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, और कनेक्शन/कार्ड/खाता मिलने के बाद उसका लगातार, सही इस्तेमाल हो पाना। स्कीम लॉन्च करना और स्कीम का असर ज़मीन पर महसूस होना, ये दो अलग-अलग लड़ाइयां हैं, और भारत अभी दूसरी लड़ाई के बीच में है।

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